कबीर की साखियाँ – Kabir Ki Sakhiyan | Class VIII

  1. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
    मेल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

साधु: साधू या सज्जन
ज्ञान: जानकारी
मेल: खरीदना
तरवार: तलवार
रहन: रहने
म्यान: जिसमे तलवार रखीं जाती है

प्रसंग – प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि हमें मनुष्य की जाति से ज्यादा उसके गुणों को सम्मान करना चाहिए।

व्याख्या  इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि हमें सज्जन पुरुष से उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए अपितु उसका ज्ञान देखना चाहिए अर्थात मनुष्य को उसकी जाति के आधार पर नहीं उसके ज्ञान के आधार पर परखना चाहिए क्योंकि जब हम तलवार खरीदने जाते हैं तो उसकी कीमत म्यान देखकर नहीं लगाते हैं।

  1. आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक।
    कह कबीर नहिं उलटिए,वही एक की एक।

आवत: आते हुए
गारी: गाली
उलटत: पलटकर
होइ: होती
अनेक: बहुत सारी

प्रसंग – प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीर जी ने कहा है कि कभी भी अपशब्द के बदले में किसी को अपशब्द मत कहो।

व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि जब हमें कोई गाली देता है तब वह एक होती है पर हम पलटकर उसे भी देते हैं तो वो बढ़ते-बढ़ते अनेक हो जाती है इसलिय जब हम उसकी एक गाली पर ही ध्यान नहीं देंगे तो वह वहीं ख़त्म हो जाएगी अर्थात वो एक की एक ही रह जायेगी।

 

  1. माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि।
    मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै,  यह तौ सुमिरन नाहिं।

माला तो कर: हाथ
फिरै: घूमना
जीभि: जीभ
मुख: मुँह
माँहि: में
मनुवाँ: मन
दहुँ: दसों
दिसि: दिशा
तौ: तो
सुमिरन: स्मरण

प्रसंग  प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास“ जी हैं। इसमें कबीरदास जी ने मन की चंचलता का वर्णन किया है। उनके अनुसार इंसान जीभ और माला से भले ही प्रभु का नाम जपता रहता है, लेकिन उसका मन अपनी चंचलता त्याग नहीं पाता है।

व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि माला को हाथ में लेकर मनुष्य मन को को घुमाता है जीभ मुख के अंदर घूमती रहती है। परन्तु मनुष्य का चंचल मन सभी दिशाओं में घूमता रहता है। मानव मन गतिशील होता है जो बिना विचारे इधर-उधर घूमता रहता है परन्तु ये भगवान् का नाम क्यों नहीं लेता।

 

  1. कबीर घास न नींदिए, जो पाऊँ तलि होइ।
    उड़ि पड़ै जब आँखि मैं, खरी दुहेली होइ।

नींदिए: निंदा करना
पाऊँ: पाँव
तलि: नीचे
आँखि: आँख
खरी: कठिन
दुहेली: दुःख देने वाली

प्रसंग – प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीर दास जी छोटे को कमजोर समझकर उसे दबाने वाले को चेतावनी दे रहें हैं।

व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि हमें कभी घास को छोटा समझकर उसे दबाना नहीं चाहिए क्योंकि जब घास का एक छोटा सा तिनका भी आँख में गिर जाता है तो वह बहुत दुख देता है अर्थात हमें छोटा समझकर किसी पर अत्याचार नहीं करना चाहिए।

  1. जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय।
    या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।

जग: संसार
बैरी: शत्रु
सीतल: शांति
आपा: स्वार्थ

प्रसंग – प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीर दास जी मनुष्य को स्वार्थ त्यागकर दयावान बनने की सीख दे रहें हैं।

व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य का मन अगर शांत है तो संसार में कोई शत्रु नहीं हो सकता। यदि सभी मनुष्य स्वार्थ का त्याग कर दें तो सभी दयावान बन सकते हैं। अर्थात मनुष्य को अपनी कमजोरियों को दूर करके संसार में प्रेम और दया फैलाना चाहिए।

 

प्रश्न अभ्यास

प्र॰1 ‘तलवार का महत्त्व होता है म्यान का नहीं’- उक्त उदाहरण से कबीर क्या कहना चाहते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- कबीरदास जी के अनुसार मनुष्य की सुंदरता उसके शरीर की अपेक्षा उसके गुणों से आकना चाहिए क्योंकि शरीर तो बाहरी आवरण है जबकि सच्चाई उसका अंर्तमन है। इसलिए कवि कहते हैं कि तलवार का महत्त्व होता है म्यान का नहीं।

प्र॰2 पाठ की तीसरी साखी-जिसकी एक पंक्ति है ‘मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं’ के द्वारा कबीर क्या कहना चाहते हैं?

उत्तर- तीसरी साखी में कबीर दास जी कहना चाहते हैं कि मनुष्य का मन चंचल होता है वह हाथ में माला और जबान पर हरिनाम तो जपता रहता है किन्तु भगवान् का नाम लेना तब सार्थक होता है जब मनुष्य अपने चंचल मन पर काबू पा लेता है।

प्र॰3 कबीर घास की निंदा करने से क्यों मना करते हैं। पढ़े हुए दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- कबीर दास जी छोटे को कमजोर समझकर उसकी उपेक्षा करने को मना करते हैं मनुष्य को घास को पैरों के नीचे वाली रौंदने वाली वस्तु समझकर उसे कमजोर नहीं मानना चाहिए क्योंकि जब एक घास का तिनका भी आँख में चला जाता है तो वह बहुत कष्ट देता है। इसलिय हमें किसी को कमजोर समझकर उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए।

प्र॰4 मनुष्य के व्यवहार में ही दूसरों को विरोधी बना लेनेवाले दोष होते हैं। यह भावार्थ किस दोहे से व्यक्त होता है?

उत्तर – यह भावार्थ अंतिम साखी में है –
जग में बैरी कोई नहीं जो मन शीतल होय।
या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।।

 

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