Vasant | Class VIII

Bus Ki Yatra Class 8 – Chapter 3

कक्षा 8 – पाठ 3 – बस की यात्रा

dhawni

 About the Author 

लेखक :     हरिशंकर परसाई
जन्म  :     22 अगस्त1924
मृत्यु  :     10 अगस्त 1995

 

 

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Bus Ki Yatra Introduction – पाठ प्रवेश

वे इस लेख के द्वारा, अपने व्यक्तिगत अनुभव का बखान करते हैं जोकि है ‘‘बस की यात्रा।” वे एक बार बस के द्वारा अपनी यात्रा करते हैं और किस तरह की परेशानियाँ इस यात्रा में आती हैं, इस सब का अनुभव इस रचना के द्वारा दर्षाया गया है।
एक बार बस से पन्ना को जा रहे थे बस बहुत ही पुरानी थी जैसा कि दर्शाया गया है इस सफर में क्या-क्या अनुभाव किया, क्या-क्या उनके साथ घटा, और उन्होंने परिवहन निगम की जो बसें होती हैं उनकी घसता हलात पर व्यंग किया है और ये भी दर्शाया गया है कि किस तरह से वे अपनी बसों की देख-भाल नहीं करते हैं और एक घसियत पद की तरह से इस रचना को लिखा है जब हम इसको पढ़ते हैं तो बहुत सी घटानाऐं हास्यपद (हँसीपद) लगती हैं और बहुत ही रोंचक हो गई है उनकी यह रचना। तो आइए हम भी चलते हैं उनकी इस यात्रा पर।

Bus Ki Yatra Summary – पाठ का सार

एक बार लेखक अपने चार मित्रों के साथ बस से जबलपुर जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए अपनी यात्रा बस से शुरु करने का फैसला लेते हैं। परन्तु कुछ लोग उसे इस बस से सफर न करने की सलाह देते हैं। उनकी सलाह न मानते हुए, वे उसी बस से जाते हैं किन्तु बस की हालत देखकर लेखक हंसी में कहते हैं कि बस पूजा के योग्य है।

नाजुक हालत देखकर लेखक की आँखों में बस के प्रति श्रद्धा के भाव आ जाते हैं। इंजन के स्टार्ट होते ही ऐसा लगता है की पूरी बस ही इंजन हो। सीट पर बैठ कर वह सोचता है वह सीट पर बैठा है या सीट उसपर। बस को देखकर वह कहता है ये बस जरूर गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के समय की है क्योंकि बस के सारे पुर्जे एक-दूसरे को असहयोग कर रहे थे।

कुछ समय की यात्रा के बाद बस रुक गई और पता चला कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ऐसी दशा देखकर वह सोचने लगा न जाने कब ब्रेक फेल हो जाए या स्टेयरिंग टूट जाए।आगे पेड़ और झील को देख कर सोचता है न जाने कब टकरा जाए या गोता लगा ले।अचानक बस फिर रुक जाती है। आत्मग्लानि से मनभर उठता है और विचार आता है कि क्यों इस वृद्धा पर सवार हो गए।

इंजन ठीक हो जाने पर बस फिर चल पड़ती है किन्तु इस बार और धीरे चलती है।आगे पुलिया पर पहुँचते ही टायर पंचर हो जाता है। अब तो सब यात्री समय पर पहुँचने की उम्मीद छोड़ देते है तथा चिंता मुक्त होने के लिए हँसी-मजाक करने लगते है।अंत में लेखक डर का त्याग कर आनंद उठाने का प्रयास करते हैं तथा स्वयं को उस बस का एक हिस्सा स्वीकार कर सारे भय मन से निकाल देते हैं।

बस की यात्रा (Bus ki Yatra)

हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें। पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घंटे भर बाद मिलती है जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुँच जाएँगे।

हम में से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था इसीलिए वापसी का यही रास्ता अपनाना ज़रूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते। क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? नहीं, बस डाकिन है।

“क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं?” एक प्रष्न किया है लेखक ने। रास्ते में डाकू-वगैरा तो नहीं मिलते लेकिन जो बस की हालत है वो बहुत ही डरावनी है। बस खराब हालत में है, पता नहीं मंजिल पर पहुँचा पाएँगी की नहीं तो लोग हमेशा उस बस से जाने से डरते है।

बस को देखा तो श्रद्धा उमड पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी। लोग इसलिए इससे सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!

बस-कंपनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमने उनसे पूछा- “यह बस चलती भी है?” वह बोले- “चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी।” हमने कहा- “वही तो हम देखना चाहते हैं। अपने आप चलती है यह? हाँ जी, और कैसे चलेगी?”
गज़ब हो गया। ऐसी बंस अपने आप चलती है।

हम आगा-पीछा करने लगे।
डॉक्टर मित्र ने कहा-“डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नयी-नवेली बसों से ज्यादा विश्वसनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी।”

हम बैठ गए। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आँखें कह रही थीं- “आना-जाना तो लगा ही रहता है। आया है, सो जाएगा-राजा, रकं, फकीर। आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।”

इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया। ऐसा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इजंन के भीतर बैठे हैं। काँच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम फौरन खिड़की से दूर सरक गए। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था कि हमारी सीट के नीचे इंजन है।

बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गांधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दूसरे से असहयेग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुजर रही थी।

सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता सीट बॉडी को छोड़कर आगे निकल गई है। कभी लगता कि सीट को छोड़कर बॉडी आगे भागी जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेदभाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हम पर बैठी है।

एकाएक बस रुक गई। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकालकर उसे बगल में रखा और नली डालकर इजंन में भेजने लगा।

अचानक बस में कुछ खराबी आ गई और वह रूक गई । बस की पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया था और पेट्रोल बहने लगा था । ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकालकर उसे बगल में रखा और नली अर्थात् एक पाईप के द्वारा इंजन में भेजने लगा।

अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोडी़ देर बाद बस-कंपनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएँगे, जैसे माँ बच्चे के मुँह में दूध की शीशी लगाती है।

बस की रफ़्तार अब पंद्रह-बीस मील हो गई थी। मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। ब्रेक फेल हो सकता है, स्टीयरिंग टूट सकता है।

प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे जिन पर पक्षी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इंतजार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।

क्षीण चाँदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गई हो। हमें ग्लानि हो रही थी कि बैचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसकी अंत्येष्टि करनी पड़ेगी

हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गई थी।

कंपनी के हिस्सेदार जो इस बस से यात्रा कर रहे थे अब वह अपनी मदद करने लगे थे उन्होंने इंजन को खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। इसके पश्चात् बस आगे बढ़ी उसकी चाल और भी कम हो गई थी। ऐसे लग रहा था जैसे कि पैदल यात्रा कर रहे हैं।

धीरे-धीरे वृद्धा की आँखां की ज्योति जाने लगी। चाँदनी में रास्ता टटोल कर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती-“निकल जाओ, बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।”

एक पुलिया के ऊपर पहुँचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया। वह बहुत जोर से हिलकर थम गई। अगर स्पीड में होती तो उछलकर नाले में गिर जाती। मैंने उस कंपनी के हिस्सेदार की तरफ पहली बार श्रद्धाभाव से देखा। वह टायरों की हालत जानते हैं फिर भी जान हथेली पर लेकर इसी बस से सफ़र कर रहे हैं। उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है।

सोचा, इस आदमी के साहस और बलिदान भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए।

अब लेखक हिस्सेदार के बारे में सोच रहे हैं कि ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो ऐसी खसता हालत में भी बस चलाते है और खुद भी उसमें सफर करते है । वे सोचते हैं कि इसे तो कंपनी का मालिक नहीं बल्कि क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए थाक्योंकि ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें अपना आत्म बलिदान देने का सहस हो, कहीं का नेता होना चाहिए ताकि वह किसी अच्छे आंदोलन का नेतृत्व कर सके।

अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते तो देवता बाँहें पसारे उसका इंतजार करते। कहते- “वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।”

दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अब हमने वक्त पर पन्ना पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना क्या, कहीं भी, कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी।

लगता था, जिंदगी इसी बस में गुजारनी है अैर इससे सीधे उस लोक को प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंजिल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव खत्म हो गए। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गए। चिंता जाती रही। हँसी-मजाक चालू हो गया।

Difficult word meaning

हाज़िर: उपस्थित   (present)
सफ़र: यात्रा         (travel)
डाकिन: डराने वाली (intimidating)
श्रद्धा: किसी के प्रति आदरए सम्मान और प्यार का भावद्ध     (respect)
उमड़: जमा होना   (overflow)
वयोवृद्ध: बूढ़ी या पुरानी (old)
निशान: चिन्ह      (mark)
वृद्धावस्था: बुढ़ापा (old age)
कष्ट: परेशानी    (trouble)
सवार: चढ़ा       (ascend)
हिस्सेदार: साझेदार (partner)
गज़ब: आश्चर्य (awesome)
विश्वसनीय :भरोसे वाली (trustworthy)
विदा: आखिरी सलाम     (goodbye)
रकं: गरीब         (poor)
कूच करने: जाना      (go)
निमित्त: कारण       (reason)
फौरन: तुरंत     (right away)
सरक: खिसक   (get aside)
सविनय अवज्ञा आंदोलनों: गाँधी जी द्वारा चलाया गया 1921 का आंदोलन (Non-cooperation movement)
ट्रेनिग: सीख (training)
दौर: ज़माने (era)
गुजर: चल  (pass by)
असहयोग: साथ न देना    (not supporting)
भेदभाव: अंतर     (discrimination)
उम्मीद: आस   (hope)
रफ़्तार: गति (speed)
भरोसा: विश्वास      (trust)
लुभावने: सुन्दर    (beautiful)
गोता: डुबकी     (dip)
इत्तफ़ाक: संयोग  (coincidence)
क्षीण: कमज़ोर    (weak)
वृक्षों: पेड़   (tree)
दयनीय: बेचारी   (poor thing)
वृद्धा: बूढी      (older)
ग्लानि: खेद     (sorry)
प्राणांत: मरना   (death)
बियाबान: जंगल (forest)
अंत्येष्टि: अंतिम क्रिया (funeral)
ज्योति: रोशनी (light)
टटोलकर: ढूंढकर (fumble)
रेंग: धीरे-धीरे (slowly)
एक पुलिया: छोटा सा पुल   (a bridge)
फिस्स: एक प्रकार की ध्वनि (a type of sound)
थम: रूक (stop)
श्रद्धाभाव: सम्मान के साथ (with respect)
जान हथेली पर लेकर: बहुत खतरा लेना    (with danger)
उत्सर्ग: बलिदान  (sacrifice)
दुर्लभ: जो कम मिलता हो   (rare)
पसारे: फैलाए    (spread)
प्राण: जान       (life)
वक्त: समय    (time)
उम्मीद: आशा   (hope)
लोक: मृत्यु लोक   (death world)
प्रयाण: प्रस्थान    (to depart)
बेताबी: बेचैनी     (restless)
तनाव: चिंता  (stress)

Bus Ki Yatra Questions Answers-प्रश्न-उत्तर

प्रश्न-1 “मैंने उस कंपनी के हिस्सेदार की तरफ़ पहली बार श्रद्धाभाव से देखा।” लेखक के मन में हिस्सेदार साहब के लिए श्रद्धा क्यों जग गई?

उत्तर-लेखक के मन में हिस्सेदार के प्रति श्रद्धाभाव इसलिए जगी क्योंकि वह थोड़े से पैसे बचाने के चक्कर में बस का टायर नहीं बदलवा रहा था और अपने साथ-साथ यात्रियों की जान भी जोखिम में डाल रहा था इसलिए लेखक ने श्रद्धाभाव कहकर उसपर व्यंग किया है।

प्रश्न-2 “लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफर नहीं करते।” लोगों ने यह सलाह क्यों दी?

उत्तर-लोगों ने लेखक को शाम वाली बस में सफर न करने की सलाह उसकी जीर्ण-शीर्ण हालत को देखकर दी। यदि रात में वह कहीं खराब हो गई तो परेशानी होगी। लोगो ने इस बस को डाकिन भी कहा।

प्रश्न-3 “ऐसा जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं।” लेखक को ऐसा क्यों लगा?

उत्तर-सारी बस लेखक को इंजन इसलिए लगी क्योंकि पूरी बस में इंजन की आवाज़ गूंज रही थी।

प्रश्न-4 “गज़ब हो गया। ऐसी बस अपने आप चलती है।” लेखक को यह सुनकर हैरानी क्यों हुई?

उत्तर-लेखक को इस बात पर हैरानी हुई की इतनी टूटी-फूटी बस कैसे चल सकती है। वे यह मानते हैं कि इस बस को कौन चला सकता है। यह तो स्वयं ही चल सकती है।

प्रश्न-5 “मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था।” लेखक पेड़ों को दुश्मन क्यों समझ रहा था?

उत्तर-लेखक को बहुत डर लग रहा था। उन्हें ऐसा लग रहा था कि बस अभी किसी पेड़ से टकरा जाएगी और वो लोग जख्मी हो जायेंगे। इसलिए वे पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहे थे।

अतिरिक्त प्रश्न

प्रश्न-1   लेखक को क्या देखकर लगा कि बस इसमें गोता लगाएगी?

उत्तर - झील

प्रश्न-2   लेखक ने बस को कैसी अवस्था में बताया?   

उत्तर – वृद्धावस्था

प्रश्न-3   लेखक और उसके मित्र कुल कितने सदस्य थे, जिन्हें बस की यात्रा करनी थी?   

उत्तर - पाँच

प्रश्न-4   पाठ 'बस की यात्रा' के लेखक कौन हैं?    

उत्तर – पाठ 'बस की यात्रा' के लेखक हरिशंकर परसाई जी हैं।

प्रश्न-5   शब्दों के अर्थ बताइए - रंक , निमित्त    

उत्तर - रंक - गरीब,  निमित्त - कारण, साधन, लक्ष्य

प्रश्न-6   पहली बार बस किस कारण रुकी?   

उत्तर - पेट्रोल की टंकी में छेद होने के कारण पहली बार बस रुकी।

प्रश्न-7   कंपनी के हिस्सेदार ने बस के लिए क्या कहा?   

उत्तर - कंपनी के हिस्सेदार ने बस के लिए कहा - बस तो फर्स्ट क्लास है जी !

प्रश्न-8   लेखक के अनुसार देवता बाँहें पसारकर किसका स्वागत करते?

उत्तर - लेखक के अनुसार देवता बाँहें पसारकर कंपनी के हिस्सेदार का स्वागत करते।

प्रश्न-9   'काँच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे उनसे बचना था' वाक्य में 'बच' शब्द का दो भिन्न अर्थों में प्रयोग हुआ है। दोनों के अर्थ बताइए।   

उत्तर - 'बच' शब्द के दो भिन्न अर्थ है - शेष रहना, सावधान रहना

प्रश्न-10   लोगों ने बस को 'डाकिन' क्यों कहा?

उत्तर - लोगों ने बस को 'डाकिन' कहा क्योंकि इस बस से यात्रा करने वाले लोगों का सुख - चैन लुट जाता है।

प्रश्न-11   इंजन स्टार्ट होने पर क्या हुआ?    

उत्तर – इंजन स्टार्ट होने पर लेखक को लगा कि जैसे सारी बस ही इंजन है और वह इंजन के अंदर बैठा है।

प्रश्न-12   लेखक और उसके दोस्त खिड़की से दूर सरककर क्यों बैठ गए?   

उत्तर - लेखक और उसके दोस्त खिड़की से दूर सरककर इसलिए बैठ गए ताकि खिड़की के काँच टूटकर उन्हेंचोटिल न कर दें।

प्रश्न-13   विदा करने आए लोगों की प्रतिक्रिया देखकर लेखक को कैसा लगा?

उत्तर - विदा करने आए लोगों की प्रतिक्रिया देखकर लेखक को लगा कि जैसे वह मरने के लिए जा रहा हो औरलोग उसे अंतिम विदाई देने आए हों।

प्रश्न-14   पाँचों मित्रों ने शाम वाली बस से जाने का निश्चय क्यों किया?

उत्तर - पाँचों मित्रों ने शाम वाली बस से जाने का निश्चय इसलिए किया ताकि लेखक और उसके मित्र जबलपुर की ट्रैन पकड़कर सुबह अपने गंतव्य तक पहुँच सके।

प्रश्न-15   ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ किसके नेतृत्व में, किस उद्देश्य से तथा कब हुआ था? इतिहास की उपलब्ध पुस्तकों के आधार पर लिखिए।

उत्तर - ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ महात्मा गाँधी के नेतृत्व में १९३० में अंग्रेज़ी सरकार से असहयोग करने तथा पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए किया गया था।

प्रश्न-16   आगे - पीछे से किसी गाड़ी को आता देख बस एकदम किनारे क्यों खड़ी हो जाती थी?

उत्तर – बस पुरानी और खटारा थी, उसकी हेडलाइटों की रोशनी भी कम थी। इसलिए वह आगे - पीछे से किसी गाड़ी को आता देख बस एकदम किनारे खड़ी हो जाती थी।

प्रश्न-17   आशय स्पष्ट कीजिए -
'आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।'    

उत्तर – इस कथन का आशय यह है कि मनुष्य को इस संसार को त्यागने अर्थात मरने के लिए एक साधन की आवश्यकता होती है। यहाँ वह साधन बस है जिसमें कि लेखक और उसके मित्र यात्रा कर रहे हैं।

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